Monday, 15 February 2016

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सीरिया संकट,,,,,,,,,,

सीरिया,,,,,,,

2011 से ही राजनीतिक तौर पर अस्थिर सीरिया इक्कीसवीं सदी की अब तक की सबसे बड़ी मानवीय तबाही झेल रहा है।तीन लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं।
एक करोड़ से ज्यादा लोग जान बचा कर दूसरे देशों में पनाह ले चुके हैं और शरणार्थी का दर्जा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1948 से 1967 के बीच संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों को लेकर कई समझौते हुए।
शरणार्थियों के संबंध में 1951 के जिनेवा समझौते में प्रावधान किया गया है पर आज इस प्रावधान का कुछ स्वार्थाी देशों के लिये कोई मोल नहीं !
उनका बस एक ही मकसद है,  मानवता कराहती रहे पर वैश्विकरण के नाम पर धर्म -जाति का लिबास ओढ़ाकर आहुति देते रहियें और ग्लोबलाइजेशन का नारा लगाते रहिये !
सीरिया मे रसायनिक हथियार के पीछे की जो भी सच्चाई हो पर इस बात से कोई इंकार नही कर सकता की वहां पर हालात काबू से बाहर हो चुके हैं और इसे बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के सुलझाना नामुमकिन है.
शरणार्थी एक बड़ी समस्या
नस्लीय, धार्मिक, राष्ट्रीयता, राजनीतिक भेदभाव के कारण अगर कोई व्यक्ति अपने देश लौटने में असमर्थ है, तो उसे उस देश में शरणार्थी का दर्जा मिल सकता है, जहां वह रह रहा है।
तसलीमा नसरीन ने इसी आधार पर भारत से नागरिकता मांगी थी, लेकिन भारतीय कट््टरपंथी मुसलिमों के दबाव में भारत सरकार ने उन्हें नागरिकता नहीं दी।
वे अब स्वीडन की नागरिक हैं, लेकिन लंबी वीजा अवधि पर ज्यादातर भारत में ही रहती हैं।
शरणार्थी एक बड़ी समस्या हैं। भारत 1970-71 में बांग्लादेश से बड़ी तादाद में आए शरणार्थियों की वजह से पैदा हुई समस्या को झेल चुका है।
इसलिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश के शरणार्थियों के कारण भारत पर आर्थिक बोझ का उल्लेख किया था।
यूरोपीय देश भी आर्थिक और सांस्कृतिक बोझ बढ़ने के कारण सीरियाई शरणार्थियों को शरण देने का विरोध कर रहे हैं।
इसलिए समुद्र के रास्ते अवैध रूप से यूरोपीय देशों में सीरियाई नागरिकों का प्रवेश हो रहा है।

: सुन्नी-शिया विवाद !!

सीरिया की मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता मार्च, 2011 में तब शुरू हुई थी जब कुछ युवाओं ने दीवारों पर सरकार-विरोधी नारे लिख दिए।
पिछले चालीस वर्ष से असद परिवार सीरिया का शासक है, इसी परिवार के बशर-उल-असद मौजूदा राष्ट्रपति हैं।
सुन्नियों का बहुमत होने के बावजूद राष्ट्रपति शिया हैं।
यह समस्या सभी मुसलिम देशों की है। सुन्नी-शिया विवाद किसी भी अन्य धर्मों से ज्यादा बड़ा है। इराक की समस्या भी यही थी।
वहां सुन्नी शासक सद्दाम हुसैन को शियाओं और कुर्दों को लेकर परेशानी रहती थी, जिसका लाभ उठा कर अमेरिका ने हमला बोल दिया था।
सीरिया में असद शासन के खिलाफ नारे लिखने वाले सभी युवक सुन्नी समुदाय के थे।
सुन्नियों में रोष की ताजा वजह बशर-उल-असद की ओर से सभी सरकारी संसाधनों का लाभ सिर्फ शियाओं तक पहुंचाना है, जिसके चलते सुन्नियों, कुर्दों और यजीदियों का जीना दूभर हो गया है।
पिछले आठ साल के सूखे ने ग्रामीणों का जीवन मुश्किल कर दिया है और उनका शहरों में पलायन हो रहा है। उनका जीवन स्तर गिरता गया है।

: सऊदी अरब – ईरान के धु्रवीकरण में पिसता सीरिया !
दीवारों पर असद-विरोधी नारे लिखने की शुरुआत सीमांत शहर 'दार' से हुई थी।
अगले ही दिन वहां की पुलिस ने सुन्नी समुदाय के पंद्रह युवाओं को गिरफ्तार कर लिया और थाने ले जाकर उन पर अत्याचार किए गए।
बशर-उल-असद समझ गए थे कि लंबे समय से दबा हुआ आक्रोश अब खुल कर सामने आ गया है, इसलिए उन्होंने इस आक्रोश को दबाने के लिए हिंसा का सहारा लिया।
शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी शुरू कर दी गई। इस पर पुलिस और फौज के खिलाफ सुन्नियों ने भी विद्रोह कर दिया।
शियाओं और सुन्नियों के बीच सीधी लाइन खिंच गई।
विश्लेषकों

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ईरान का समर्थन पाने के लिए बशर-उल-असद ने रणनीति के तहत धु्रवीकरण किया।
अब ईरान की ओर से सीरिया की असद सरकार को समर्थन मिल रहा है और बागियों को सऊदी अरब और कतर से समर्थन मिल रहा है।
इन तीनों देशों के हजारों मरजीवड़े सीरिया के खूनी संघर्ष में शामिल हैं।

: क्या अमेरिका,   सीरिया को बाजार की तरह इस्तेमाल कर रहा
पिछले तीन वर्षों से सीरिया गृहयुद्ध का शिकार है, जहां हर रोज सैकड़ों लोग बम धमाकों में मारे जा रहे हैं।
अभी हाल में खबर आई कि विद्रोहियों की ओर से इस्तेमाल की जा रही विस्फोटक सामग्री और हथियार अमेरिका के कारखानों में बने हुए हैं।
सवाल है कि क्या अमेरिका की ओर से सीरिया को बाजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
अमेरिका अफगानिस्तान और इराक से निकल चुका है, लेकिन अल-कायदा के लोग दोनों जगहों पर मौजूद हैं।
अल-कायदा के नए रूप आइएसआइएस ने इराक के एक तिहाई हिस्से पर कब्जा कर रखा है।
उसने अपना नाम बदल कर आइएसआइएस (इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक ऐंड सीरिया) कर लिया है।

: दुनिया में तबाही का आलम, उपाय तलाशने जरूरी
अब तक करीब चालीस लाख शरणार्थियों ने खुद को संयुक्त राष्ट्र में पंजीकृत करवाया है, लेकिन अनुमान है कि पलायन करने वालों की संख्या एक करोड़ से ज्यादा है।
सीरिया में कुछ वैसा ही हो रहा है, जैसा दो दशक पहले रवांडा में हुआ था।
शायद रवांडा के बाद यह दूसरा जनसंहार है। रवांडा में चौदह प्रतिशत आबादी वाले टूरसी समुदाय के आठ लाख लोगों का जनसंहार हुआ था।
अगर आइएसआइएस के खौफ से दुनिया में इस कदर तबाही का आलम है, तो उससे पार पाने के लिए उपाय तलाशने जरूरी हैं।
सीरिया में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवाजें उठ रही हैं, तो उन्हें इस तरह दबा दिया जाना ठीक नहीं।
सीरिया के राष्ट्रपति हाफेज अल-अस्सद की मृत्यु के बाद उनके बेटे बशर अल-अस्सद को सीरिया का राष्ट्रपति बनाया गया था।
उनके पिता की मृत्यु के बाद मार्च 2011 से ही सीरिया में गृह युद्ध शुरू हो गए थे। संयुक्त राष्ट्र के तब के अनुमान के अनुसार गृहयुद्ध में करीब 220,000 लोग मारे गए थे।
इसकी शुरूआत तब हुई जब 2011 में कुछ बच्चों को गिरफ्तार कर लिया गया था।
तब से यह देश दूसरे विश्व युद्ध के बाद से सबसे बड़े मानवीय संकट से गुज़र रहा है।

: आखिर पश्चिमी देशों की दिलचस्‍पी क्‍यों हैं? आईएसआइएस आखिर क्‍या चाहता है ?

सीरिया में सिर्फ सत्ताधारी दल, विरोधी औऱ आईएसआईएस ही नहीं लड़ रहे, केवल उनके ही हित दांव पर नहीं लगे हैं, बल्कि रूस और अमेरिका से लेकर अनेक पश्चिमी देशों की दिलचस्पी भी सीरिया युद्ध को लेकर है।
रूस सीरिया के सत्ताधारी नेता का समर्थक है, जबकि पश्चिमी ताकतें चाहती हैं कि सीरिया में सत्ता परिवर्तन हो। उधर, आईएसआईएस पूरे सीरिया पर जल्द से जल्द कब्ज़ा चाहता है।
पिछले कुछ सालों में आईएसआईएस ने एक के बाद एक कई खौफनाक वारदातों को अंजाम दिया है जिनमें सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है।
यही कारण है कि आतंक और खौफ का खात्मा करने के लिए दुनिया के तमाम मुल्कों ने आईएसआईएस के खिलाफ सीधी जंग छेड़ दी है।
एक तरफ है रूस जिसके साथ है सीरिया और इराक तो दूसरी तरफ है अमेरिका, जिसके साथ ब्रिटेन, तुर्की समेत बाकी पश्चिमी देश हैं।
आईएसआईएस के बारे में कहा जा रहा है कि उसका खात्मा तब तक नहीं हो सकता जब तक कि दुनिया के बड़े देश सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद को लेकर एकमत नहीं हो जाते। अभी रूस और ईरान, दोनों ही इस बात पर अड़े हैं कि बशर अल असद ही सीरिया के राष्ट्रपति पद पर रहेंगे।

किस देश का सीरिया संकट को लेकर क्या है रुख-

रूसः

रूस आज सीरिया का सबसे बड़ा सहयोगी बनकर सामने आया है।
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन लगातार कहते रहे हैं कि इस मुद्दे का समाधान राजनीतिक हल के जरिए ही निकाला जा सकता है।
हालांकि तमाम अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं को दरकिनार कर रूस सीरिया की सेना को लगातार हथियार दे रहा है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में राष्ट्रपति असद के खिलाफ प्रस्ताव रूस के विरोध के चलते गिर गया।
रूस पर आरोप लगता रहा है कि रूसी हवाई हमले का मकसद राष्ट्रपति असद की मदद करना है, न कि आईएसआईएस का खत्मा।
इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि रूस सीरिया के भविष्य में भागीदारी चाहता है।
वो जानता है कि जब नया सीरिया बनेगा तो सब कुछ ईरान को मिलेगा।

अमेरिकाः

रूस के ठीक विपरीत अमेरिका सीरिया में हिंसा के लिए राष्ट्रपति असद को जिम्मेदार ठहराकर उनसे गद्दी छोड़ने की मांग कर रहा है।
रूस द्वारा बशर अल-असद को मदद पहुंचाने से अमेरिका भड़का हुआ है।
अमेरिका सीरिया के विपक्षी गठबंधन 'नेशनल कोएलिशन' का समर्थक है और उसे हथियार भी मुहैया कर रहा है।
वो इराक में तो आईएस पर हमले कर रहा है लेकिन सीरिया में सीधे हस्तक्षेप से दूर है।
सीरिया में पांच हजार विद्रोहियों को ट्रेनिंग और हथियारबंद कर आईएसआईएस के खिलाफ लड़ने की उसकी योजना पहले ही फेल हो चुकी है।

सऊदी अरबः

अमेरिका की ही तरह सुन्नी बहुल खाड़ी देश सऊदी अरब भी किसी भी कीमत पर असद को हटाने पर अड़ा है।
2013 में जब असद पर रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का आरोप लगा था तब सऊदी अरब चाहता था कि अमेरिका हस्तक्षेप करे।
अमेरिका द्वारा ऐसा न करने पर सऊदी अरब नाराज था, हालांकि अब ये देश अमेरिका के नेतृत्व में आईएसआईएस के खिलाफ अभियान में शामिल है।

तुर्कीः

तुर्की भी असद का विरोधी और विपक्षी गुट का प्रमुख समर्थक है।
हाल ही में उसने सीरिया में बम बरसाने जा रहे रूसी विमान को गिराकर बता दिया था कि वो किस हद तक जा सकता है।
सीरिया से सबसे अधिक शरणार्थी तुर्की में ही गए हैं।
हालांकि वह सीरियन कुर्दिश पॉपुलर प्रोटेक्शन यूनिट (वाईपीजी) को दिए जा रहे गठबंधन देशों के समर्थन का आलोचक है।
दरअसल वाईपीजी तुर्किश कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी से संबंधित है जिसे तुर्की, यूरोपीय यूनियन और अमेरिका एक चरमपंथी संगठन मानते हैं।

ईरानः

शिया ताकत ईरान अरब देशों में सबसे करीबी दोस्त सीरिया के राष्ट्रपति असद को बनाए रखने के लिए अरबों डॉलर खर्च कर रहा है और इसके लिए सीरियाई सरकार को रियायती दरों पर हथियार, सैन्य सलाहकार, पैसा, तेल मुहैया करा रहा है।
ईरान इसे शियाओं के पवित्र स्थल की रक्षा करने का हवाला दे रहा है।
लेबनानी शिया इस्लामी आंदोलन हिजबुल्लाह तक ईरानी हथियार पहुंचाने के लिए सीरिया मुख्य रास्ता है।
मीडिया खबरों के अनुसार हिजबुल्लाह ने सीरिया में अपने लड़ाके ईरान के प्रभाव में आकर ही भेजे हैं।
ईरान का साफ कहना है कि सीरिया की सरकार को कमजोर करके आतंकवादियों का मुकाबला नहीं किया जा सकता।

चीनः

सीरिया में रूस का सैन्य दखल एशिया की दो महाशक्तियों चीन और भारत की विदेश नीति की परीक्षा भी है।
भारत और चीन दोनों ही सीरिया मुद्दे पर खुलकर कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं लेकिन किसी भी सैनिक कार्रवाई का विरोध करते रहे हैं।
चीन पर हमेशा से यह आरोप लगता रहा है कि अमेरिका के तमाम विरोधों के बाद भी चीन ने सीरिया की असद सरकार को बड़ी संख्या में हथियार बेचे।
अंतरराष्ट्रीय जानकारों का मानना है कि चीन ने अपनी इस नीति में बदलाव रूस का समर्थन पाने के लिए किया है लेकिन इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि चीन का यह कदम अमेरिका और पश्चिमी देशों के उसके सहयोगियों को नीचे दिखाने की एक कोशिश भी हो सकती है।
इन सबके बीच चीन की यह चिंता भी जायज है कि बशर अल-असद के बाद सीरिया अस्थिर होगा और इसका सीधा असर चीन के व्यापारिक हितों पर पड़ सकता है।
गौरतलब है कि फिलहाल मध्य-पूर्व के देशों से ही चीन अपनी जरूरत का आधा तेल आयात करता है।

ब्रिटेनः

अमेरिका की तरह ब्रिटेन भी सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद को पद से हटाने के पक्ष में है और ब्रिटेन का मानना है कि बीते चार सालों से देश में मारे गए ढाई लाख से भी अधिक लोगों की मौत के लिए असद की सेना जिम्मेदार है।
हालांकि पेरिस हमले के बाद फ्रांस और रूस के बाद ब्रिटेन ने भी आईएसआईएस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
जर्मनीः चांसलर एंजेला मॉर्केल ने सीरिया संकट के हल के लिए राष्ट्रपति असद के साथ मिलकर कदम उठाने की बात कही है।
मॉर्केल का साफ मानना है कि सीरियाई शरणार्थियों का संकट भी उनके देश में सुरक्षा बहाल करने के साथ ही खत्म होगा।

फ्रांसः

आईएसआईएस के खिलाफ अमेरिका और नाटो सैनिकों ने जंग की शुरुआत काफी पहले कर दी थी लेकिन पेरिस हमले के बाद दुनिया के कई मुल्कों ने भी सीधे तौर पर आईएसआईएस से टकराने का फैसला कर लिया।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद ये पहला मौका था, जब फ्रांस और रूस एक साथ मिलकर अपने किसी दुश्मन को निशाना बना रहे थे।
भारत की चुनौती

अपने चिर प्रतिद्वंद्वी चीन के विपरीत भारत सीरिया संकट और मध्य-पूर्व को लेकर अपनी स्थिति को खुलकर सामने रखता रहा है और इसका मुख्य कारण यह है कि यह पूरा क्षेत्र भारत की सुरक्षा और ऊर्जा की जरूरतों से जुड़ा है और इसी वजह से भारत बशर अल असद के समर्थन में है।
भारत हमेशा से ही सीरिया संकट का समाधान बातचीत के जरिए निकालने के पक्ष में रहा है।
लेकिन रूस ने सीरिया पर हमला कर भारत की मुश्किलें जरूर बढ़ा दी हैं।
बड़ा सवाल ये है कि क्या ऐसी स्थिति में भारत अपने पुराने मित्र रूस के साथ खड़ा होगा या फिर अमेरिका के साथ बन रहे अपने खास संबंधों को खतरे में डालेगा?
हालांकि भारत हमेशा की तरह इस मुद्दे पर भी खामोशी की नीति को सबसे बेहतर मान रहा है।
लेकिन भारत की इस चुप्पी का असर सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता पाने की कोशिशों पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का साफ मानना है कि शीतयुद्ध के इस माहौल में भारत को स्थायी सदस्यता पाने के लिए गुटनिरपेक्ष की नीति को छोड़ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर ज्यादा जिम्मेदार होना पड़ेगा।

आईएसआईएस

इस्लामी राज्य जून २०१४ में निर्मित एक अमान्य राज्य तथा इराक एवं सीरिया में सक्रिय जिहादीसुन्नी सैन्य समूह है
इस संगठन के कई पूर्व नाम हैं जैसे आईएसआईएस अर्थात् 'इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया', आईएसआईएल्, दाइश आदि।
आईएसआईएसनाम से इस संगठन का गठन अप्रैल 2013 में हुआ।
इब्राहिम अव्वद अल-बद्री उर्फ अबु बक्र अल-बगदादी इसका मुखिया है।
शुरू में अल कायदा ने इसका हर तरह से समर्थन किया किन्तु बाद में अल कायदा इस संगठन से अलग हो गया।
अब यह अल कायदा से भी अधिक मजबूत और क्रूर संगठन के तौर पर जाना जाता हैं।[4]
यह दुनिया का सबसे अमीर आतंकी संगठन है जिसका बजट 2 अरब डॉलर का है।
२९ जून २०१४ को इसने अपने मुखिया को विश्व के सभी मुसलमानों का खलीफा घोषित किया है।
विश्व के अधिकांश मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों को सीधे अपने राजनीतिक नियंत्रण में लेना इसका घोषित लक्ष्य है।
इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये इसने सबसे पहले लेवेन्त क्षेत्र को अपने अधिकार में लेने का अभियान चलाया है जिसके अन्तर्गत जॉर्डन, इजरायल,फिलिस्तीन, लेबनान, कुवैत, साइप्रस तथा दक्षिणी तुर्की का कुछ भाग आता हैं।
आईएसआईएस के सदस्यो की संख्या करीब 10,000 हैं|

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